116 : मुक्त-ग़ज़ल - जब किसी काम की ................


जब किसी काम की शुरुआत बिगड़ जाती है ॥
फिर तो जैसे हर एक बात बिगड़ जाती है ॥
जितना सोचें कि बच निकल लें खुरदुरेपन से,
अपनी चिकनाई उतना और रगड़ जाती है ॥
हाय तक़्दीर तरसते हैं जिसकी सुहबत को ,
हमसे अक्सर वो न मिलने को बिछड़ जाती है ॥
मेरी चादर है ये कि इक रुमाल है कोई ,
सिर को ढँकने लगूँ तो जाँघ उघड़ जाती है ॥
उसको जितना मैं सुलह के लिए मनाता हूँ ,
उतना वो नाज़नीं और-और झगड़ जाती है ॥
ज़िंदगी जैसे मेरी है लिबास मुफ़लिस का ,
लाख पैबंद लगाऊँ ये उधड़ जाती है ॥
मैं जो मंजिल की तरफ़ डग अगर बढ़ाऊँ दो ,
मुझसे ये चार कदम दूर को बढ़ जाती है ॥
काली करतूतों के खुलने के डर से नै ये तो ,
आदतन ही मेरी पेशानी सुकड़ जाती है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (10-02-2014) को "चलो एक काम से तो पीछा छूटा... " (चर्चा मंच-1519) पर भी होगी!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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बसंतपंचमी की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
बहुत शानदार लिखा ... खासतौर पर चादर है या रुमाल कोई वाला अशआर !!
धन्यवाद ! Lekhika 'Pari M Shlok' जी !

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