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Showing posts from February, 2014

*मुक्त-मुक्तक : 494 - ताक़त के साथ-साथ............

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ताक़त के साथ-साथ में रखते हों शरफ़ भी ॥ क्या इस जहाँ में अब भी इस क़दर हैं हिम्मती ? गर जानता हो कोई तो फ़ौरन बताये मैं – महलों में उनको ढूँढूँ या खोजूँ कुटी-कुटी ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 493 - हँसने की आर्ज़ू में............

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हँसने की आर्ज़ू में ज़ार रो के मरे  है ॥ खा-खा के धोखा खामियाजा ख़ास भरे है ॥ अहमक़ नहीं वो नादाँ नहीं तो है और क्या ? इस दौर में उम्मीदे वफ़ा जो भी करे है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 492 - बतलाओ न दो-चार नहीं..........

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बतलाओ न दो-चार नहीं सैकड़ों दफ़ा ॥ तारी किये हैं तुमने मुझपे ज़ुल्म-ओ-जफ़ा ॥ फिर भी किये ही जाऊँ तुमसे इश्क़-ओ-वफ़ा ॥ होता नहीं हूँ क्यों कभी भी बरहम-ओ-ख़फ़ा ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 491 - है गर तवील ज़िंदगी...............

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है गर तवील ज़िंदगी की तुझको सच में चाह ॥ दूँगा मैं तुझको सिर्फ़ोसिर्फ़ एक ही सलाह ॥ है क्योंकि तू औलादे हरिश्चंद्र इसलिए , मत सुर्ख़ को कहना तू सुर्ख़,स्याह को न स्याह ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 490 - चुप-चुप रहने वाला..............

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चुप-चुप रहने वाला आगे बढ़-बढ़ बोले ॥ नये-नये नायाब बहाने गढ़-गढ़ बोले ॥ ये हैरतअंगेज़ कारनामा वो करता , जिसके सिर पर जादू इश्क़ का चढ़-चढ़ बोले ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

119 : मुक्त-ग़ज़ल - जबकि दिल आ गया.............

जबकि दिल आ गया किसी पर है ॥ कैसे कह दूँ कि हाल बेहतर है ? तू किसी और से ये मत कहना , हालाँकि मामला उजागर है ॥ उसने सौ बार कह दिया तो क्या ? वो ग़लत और ग़लत सरासर है ॥ आँख क्यों ख़ुद ब ख़ुद न झुक जाये , सामने शर्मनाक मंजर है ॥ मुझसे पूछो न आशिक़ी क्या है ? कैसे बोलूँगा दर्दे सर भर है ? काम दमकल का बाल्टी से करूँ , हाय जो जल रहा मेरा घर है ॥ नींद आये मगर न आयेगी , जिसपे लेते हैं खुदरा पत्थर है ॥ ये नहीं के वो मुझसे बेहतर है , हाँ ! किसी तरह बहुत ऊपर है ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 489 - इसकी धड़कन अलग है..............

इसकी धड़कन अलग है बेढब है ॥ इसमें पहले भी न थी नै अब है ॥ दिल को मेरे खँगाल लो जितना , आर्ज़ू के सिवा यहाँ सब है ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 488 - मुस्तक़िल जेह्नोदिल में................

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मुस्तक़िल जेह्नोदिल में  आन बसा जा न सका ॥ वो स्वाद हमने चखा 
जिसका मज़ा जा न सका ॥ दोबारा हो न सका 
हाय मयस्सर वो मगर , शराबे वस्ल का ताउम्र 
नशा जा न सका ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

118 : मुक्त-ग़ज़ल - मुझे दोस्तों से मिला..............

मुझे दोस्तों से मिला न तू , मुझे दुश्मनी का शौक़ है ॥ मुझे प्यार से तू देख मत , मुझे बेरुख़ी का शौक़ है ॥ मुझे इंतिहा में न बाँध तू , मुझे हद से बाहर जाने दे , मुझे मत ख़ुदा का दे वास्ता , मुझे काफ़िरी का शौक़ है ॥ मुझे हर तरफ़ दिखता है ख़ालिस स्याह और बस स्याह ही , मुझे रौशनी नहीं चाहिए , मुझे तीरगी का शौक़ है ॥ मुझे कह लो तुम खुदगर्ज़ या बड़े शौक़ से मतलब परस्त , मुझे लेकिन अपने काम से बस काम ही का शौक़ है ॥ मेरी ज़िंदगी का जो हाल हो , मुझे फिर भी अपनी सर क़सम , दुश्वार है तो भी क्या हुआ ? इसी ज़िंदगी का शौक़ है ॥ किसे यह नहीं होता पता कि शराब कैसी चीज़ है ? करे क्या मगर जिसे रात-दिन बस मैकशी का शौक़ है ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 487 - झुका-झुका सर..................

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झुका-झुका सर उठा-उठा कर 
निगाह करते हैं ॥ कभी-कभी कुछ बता-बता कर 
गुनाह करते हैं ॥ न जिसके क़ाबिल,न जिसके लायक 
मगर ख़ुदाई से , उसी को पाने की ज़िद उसी की 
वो चाह करते हैं ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 486 - पहले के जितने भी थे................

पहले के जितने भी थे वो सारे ही अब बंद ॥ इश्क़-मुहब्बत फ़रमाने वाले छुईमुई ढब बंद ॥ क्या चुंबन क्या आलिंगन सब व्रीड़ा हीन करो , शर्म-हया-संकोच-लाज-लज्जा-लिहाज सब बंद ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक 485 - इक बूँद भर से कलकल.............

इक बूँद भर से कलकल 
आबे चनाब होकर ॥ भर दोपहर का ज़र्रे से 
आफ़्ताब होकर ॥ अपने लिए तो जैसा हूँ 
ठीक हूँ किसी को , दिखलाना चाहता हूँ 
मैं कामयाब होकर ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 484 - नहीं कुछ मुफ़्त में.................

नहीं कुछ मुफ़्त में देता वो पूरा दाम लेता है ॥ वगरना उसके एवज में वो दूना काम लेता है ॥ नहीं वो हमसफ़र मेरा न मेरा रहनुमा लेकिन , फिसलने जब भी लगता हूँ वो आकर थाम लेता है ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 483 - मुसाफ़िर कोई................

मुसाफ़िर कोई हमसफ़र चाहता है ॥ सड़क के किनारे शजर चाहता है ॥ कि जैसे हो तितली को गुल की तमन्ना , मुझे भी कोई इस क़दर चाहता है ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 482 - मैं छोटी-छोटी सुइयों..............

मैं छोटी-छोटी सुइयों वो लंबे तीरों का ॥ मैं सौदागर हूँ छुरियों का वो शमशीरों का ॥ मैं सिर पर रख बेचूँ लोहा वो दूकान सजा , वो भी मुझसा ही है फ़र्क है बस तक़्दीरों का ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 481 - यों दिखा करता हूँ.....................

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यों दिखा करता हूँफूला सा भले मैं ॥ पर दबा हूँ आपकीस्मृति-तले मैं ॥ आगे यद्यपि मैंविहँसता हूँ जगत के , झेलता हूँ किन्तु हिय मेंज़लज़ले मैं ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 480 - सारी दुनिया से अलग..................

सारी दुनिया से अलग भाग-भाग रहता था ॥ याद में उसकी खोया जाग-जाग रहता था ॥ मैं भी हँसता था कभी जब वो मुझपे आशिक़ थे , दिल ये मेरा भी सब्ज़ , बाग़बाग़ रहता था ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

117 : मुक्त-ग़ज़ल - शायद उसके जैसा इस...............

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शायद उस सा इस दुनिया में कोई और नहीं ॥ सबके अपने-अपने छत हैं उसका ठौर नहीं ॥ डाकू , चोर , लुटेरों की दुनिया में नहीं कमी , लेकिन चित्त चुराने वाला माखन–चोर नहीं ॥ ज़र , ज़मीन , इंसान , जानवर सचमुच फ़लक तलक , सब क़ाबू में कर लोगे पर दिल पर ज़ोर नहीं ॥ उसको छोटे-छोटे कीट-पतंगे साफ़ दिखें , हम जैसों पर उसकी नज़रें करती ग़ौर नहीं ॥ मनवा कर रहता अपनी हर बात ज़माने से , एक हुक़्मराँ है वो चाहे सिर पर मोर नहीं ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 479 - नाम-ए-इश्क़ हो...............

नाम-ए-इश्क़ हो सरनाम न बदनाम बने ॥ आबे ज़मज़म रहे , न मैक़दे का जाम बने ॥ सख़्त पाबन्दियाँ हों पेश इश्क़बाज़ी पे , सात पर्दों की बात इरादतन न आम बने ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

कविता : कैसे सिगरेट अब जलाएंगे ?

वाँ तो दिन पे भी ढेर सूरज हैं , और याँ शब पे इक चिराग़ नहीं । याँ पे भूखे भी लोग मर जाएँ , और वाँ जह्र फाँक झाग नहीं ! मुझको ज़िंदा ही फूँक पछताएँ , कैसे सिगरेट अब जलाएंगे ? राख़ ठोकर से खूर गुस्साएँ , इसमें अब कोई आग-वाग नहीं ॥ सात पर्दों में असली सूरत रख , तुम ज़माने में हो ख़ुदा बजते , लाख चेहरे हैं एक चेहरे पर , इक भी चेहरे पे कोई दाग़ नहीं !! सच कहूँ तो ज़ुबाँ का हूँ कड़वा , मीठा बोलूँ तो चापलूस तभी रेंकनें-भौंकने का आदी मैं , कूकने का गले में राग नहीं ॥ सबको अपना सा क्यों समझते हो ? क्या मज़ेदार बात करते हो ? मुझसे आसाँ सवाल बच्चों से ! सोचते होगे याँ दिमाग़ नहीं ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 478 - मुक्त मन से बन सँवर कर............

मुक्त मन से बन सँवर कर पूर्णतः वह धज्ज थी ॥ मुझसे सब इच्छाओं को सट मानने झट सज्ज थी ॥ केलि के उपरांत आभासित हुआ वह त्यागिनी , अप्रतिम सुंदर मनोहर भर थी पर निर्लज्ज थी ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 477 - देखने में ही नहीं.............

देखने में ही नहीं टूटा हुआ सा मैं ॥ दरहक़ीक़त ही तो हूँ फूटा हुआ सा मैं ॥ ’’ सबब तुझको पकड़ने की तमन्ना में , दीन , दुनिया , ख़ुद से भी छूटा हुआ सा मैं ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 476 - सारे कंकड़ वो...............

सारे कंकड़ वो बेशक़ीमती नगीने सा ॥ सब ही पतझड़ वही बसंत के महीने सा ॥ दुनिया गर एक खौफ़नाक दरिया तूफ़ानी , वो,लगाता जो पार लगता उस सफ़ीने सा ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 474 - दस्ती - रूमाल ठीक................

दस्ती - रूमाल ठीक - ठीक न धोना आया ॥ पतला सा धागा सुई में न पिरोना आया ॥ तुमने उसको पहाड़ टालने का काम दिया , जिसको टीला तो क्या ढेला भी न ढोना आया ! -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 473 - अहसास दे शरबत..................

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अहसास दे शरबत जो पुरानी शराब सा ॥ सच सामने हो फिर भी हो महसूस ख़्वाब सा ॥ फ़ौरन निगाह का इलाज कीजिए जनाब , अच्छा नहीं चराग़ दिखना आफ़ताब सा ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 472 - क़तरा-क़तरा तेरी................

क़तरा-क़तरा तेरी यादों में आँखों ने ढाया ॥ अश्क़ जब ख़त्म हो गए तो खूँ भी छलकाया ॥ राह देखी कुछ ऐसी तेरी दम-ए-आख़िर तक , पलकों को मरके भी खुल्ला रखा न झपकाया ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

116 : मुक्त-ग़ज़ल - जब किसी काम की ................

जब किसी काम की शुरुआत बिगड़ जाती है ॥ फिर तो जैसे हर एक बात बिगड़ जाती है ॥ जितना सोचें कि बच निकल लें खुरदुरेपन से, अपनी चिकनाई उतना और रगड़ जाती है ॥ हाय तक़्दीर तरसते हैं जिसकी सुहबत को , हमसे अक्सर वो न मिलने को बिछड़ जाती है ॥ मेरी चादर है ये कि इक रुमाल है कोई , सिर को ढँकने लगूँ तो जाँघ उघड़ जाती है ॥ उसको जितना मैं सुलह के लिए मनाता हूँ , उतना वो नाज़नीं और-और झगड़ जाती है ॥ ज़िंदगी जैसे मेरी है लिबास मुफ़लिस का , लाख पैबंद लगाऊँ ये उधड़ जाती है ॥ मैं जो मंजिल की तरफ़ डग अगर बढ़ाऊँ दो , मुझसे ये चार कदम दूर को बढ़ जाती है ॥ काली करतूतों के खुलने के डर से नै ये तो , आदतन ही मेरी पेशानी सुकड़ जाती है ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति