*मुक्त-मुक्तक : 462 - कर लूँ गुनाह मैं भी..................


कर लूँ गुनाह मैं भी अगर कुछ मज़ा मिले ॥
फिर उसमें भी हो लुत्फ़ जो मुझको सज़ा मिले ॥
यों ही मैं क्यों करूँ कोई क़ुसूर कि जिसमें ,
बेसाख्ता हों होश फ़ाख्ता क़ज़ा मिले ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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