*मुक्त-मुक्तक : 461 - इक भी बेदिल से नहीं...............


इक भी बेदिल से नहीं सब ही रज़ा कर लिखिये ॥
लफ़्ज़-दर-लफ़्ज़ समझ-सोच-बजा कर लिखिये ॥
डायरी ख़ुद की कभी आम भी हो सकती है ,
दिल के जज़्बात शायरी में सजा कर लिखिये ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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