*मुक्त-मुक्तक : 459 - आबे ज़मज़म समझ के............


आबे ज़मज़म समझ के जह्र पिये जाता हूँ ॥

बस ख़ुदा तेरी ही दम पे मैं जिये जाता हूँ ॥

ज़िंदगी यूँ तो है दुश्वार मेरी सख़्त से सख़्त ,

नाम रट-रट के तेरा सह्ल किये जाता हूँ 
( सह्ल = सरल , सुगम , आसान )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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