*मुक्त-मुक्तक : 458 - बहुत सी पास में खुशियाँ............


बहुत सी पास में खुशियाँ हों या इफ़्रात में ग़म-वम ,
कि रेगिस्तान हो दिल में या क़ामिल आब-ए-ज़मज़म ,
तज़ुर्बा है मेरा ज़ाती ये ज़ाती सोच है मेरी -
कि शायर की क़लम में तब ही आ पाता है दम-ख़म ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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