*मुक्त-मुक्तक : 451 - बेवजह वो मुझसे..................


बेवजह वो मुझसे बरहम हो रही है ॥
हर मसर्रत मेरी मातम हो रही है ॥
कर रही है जिस तरह वो बदसुलूकी,
रफ़्ता-रफ़्ता ज़िंदगी कम हो रही है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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हीरालाल भाई आपकी कविता दिल को छूने वाली होती है, मैं आपका पाठक हूँ। ऐसे ही मर्मस्‍पर्शी कविताएं रचते रहिए आप....आपको असीम शुभकामनाएं....
धन्यवाद ! अमित विश्वास जी !

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