*मुक्त-मुक्तक : 450 -न जाने क्यों ख़ामोशी भी................


न जाने क्यों ख़ामोशी भी शोर-शराबा लगती है ?
मरहम-पट्टी-ख़िदमतगारी ख़ून-खराबा लगती है ॥
ख़ुद का जंगल उनको शाही-बाग़ से बढ़कर लगता है ,
मेरी बगिया नागफणी का सह्रा-गाबा लगती है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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