*मुक्त-मुक्तक : 446 - चाहे वो गंगा का हो.................


चाहे वो गंगा का हो सिंध या चनाब का ॥
इस वक़्त वो प्यासा है तो दरिया के आब का ॥
बेशक़ तड़प तड़प के मर भी जाएगा मगर ,
प्याला नहीं लगाएगा मुँह से शराब का ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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