*मुक्त-मुक्तक : 444 - जो कुछ बजा न हो..................


जो कुछ बजा न हो वो भी वाज़िब है बजा है ॥
वो हों तो दर्द लुत्फ़ है ग़म एक मज़ा है ॥
उनके बग़ैर क़ैद है बख़ुदा रिहाई भी ,
इनआम भी जुर्माना है इक सख़्त सज़ा है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति। मकर संक्रान्ति की हार्दिक शुभकामनाएँ !
धन्यवाद ! राजेन्द्र कुमार जी !

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