*मुक्त-मुक्तक : 442 - यक़ीनन वो नहीं मेरा.................


यक़ीनन वो नहीं मेरा असल मक़सद मेरी मंजिल ॥
न मैं कोई डूबती कश्ती न वो ही नाख़ुदा-साहिल ॥
नहीं होता मुझे बर्दाश्त हरगिज़ भी गुरूर उनका ,
लिहाजा उनको करना है मुझे हर हाल में हासिल ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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