*मुक्त-मुक्तक :440 - कहाँ अब रात होगी..................


कहाँ अब रात होगी और कहाँ अपनी सहर होगी ?
बग़ैर उनके भटकते ज़िंदगी शायद बसर होगी !
रहेंगे जह्न-ओ-दिल में जब वही हर वक़्त छाये तो ,
हमें कब अपने जीने और मरने की ख़बर होगी ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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