*मुक्त-मुक्तक : 439 - रोती-सिसकती क़हक़हों.............


रोती-सिसकती क़हक़हों भरी हँसी लगे ॥
बूढ़ी मरी-मरी जवान ज़िंदगी लगे ॥
इक वहम दिल-दिमाग़ पे तारी है आजकल ,
बिलकुल लटकते साँप सी रस्सी पड़ी लगे ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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