*मुक्त-मुक्तक : 438 - कोई कितना भी हो ग़लीज़............


कोई कितना भी हो ग़लीज़ या कि पाक यहाँ ॥
सबको होना है लेक एक रोज़ ख़ाक यहाँ ॥
ज़िंदगी लाख हो लबरेज़ दर्द-ओ-ग़म से मगर ,
किसको लगती नहीं है मौत खौफ़नाक यहाँ ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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