*मुक्त-मुक्तक : 437 - मुझको रोज़ अपना................



मुझको रोज़ अपना दीदार दिया करना तुम ॥

एकटक मेरा भी दीदार किया करना तुम ॥

मैं तुम्हारे बिन जब-जब ज़िंदगी तबाह करूँ ,

ख़ुद को कम-अज-कम तब-तब मार लिया करना तुम ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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