*मुक्त-मुक्तक : 436 : दूर फ़ौरन ही ये तनहाई...............


दूर फ़ौरन ही ये तनहाई की ग़रीबी हो ॥

और सिर्फ़ एक वो ही वो मेरी क़रीबी हो ॥

हो नशे में मेरे , मुझ पर फ़िदा , मुझ पर आशिक़

या ख़ुदा करदे क़रामात ख़ुशनसीबी हो ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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