*मुक्त-मुक्तक : 435 - मैं रह गया था जिसके..................


मैं रह गया था जिसके अतल हृदय में धँस के ,

सजल नयन लिए निहारती थी हँस–हँस के ॥

हाव सब चुम्बकीय , भाव इंद्रजाल महा ,

उसकी कमनीयता में कौन उबरता फँस के ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Comments

mahesh soni said…
लाजवाब.. क्या बात है..
VINOD SHILLA said…
बहुत खूब
बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शुक्रवार (03-01-2014) को "एक कदम तुम्हारा हो एक कदम हमारा हो" (चर्चा मंच:अंक-1481) पर भी होगी!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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ईस्वीय सन् 2014 की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
बहुत सुन्दर !
नया वर्ष २०१४ मंगलमय हो |सुख ,शांति ,स्वास्थ्यकर हो |कल्याणकारी हो |
नई पोस्ट विचित्र प्रकृति
नई पोस्ट नया वर्ष !
धन्यवाद ! कालीपद प्रसाद जी !
Pratibha Verma said…
बहुत सुन्दर प्रस्तुति। । नव वर्ष की हार्दिक बधाई।
धन्यवाद ! Pratibha Verma जी !
धन्यवाद ! रूपचन्द्र शास्त्री मयंक जी !

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