115 : मुक्त-ग़ज़ल - आज तो कुछ भी नहीं.................


आज तो कुछ भी नहीं मुझसे छिपाया जायेगा ॥
बोझ राज़-ए-दिल का अब न और उठाया जायेगा ॥
मैं तमन्नाई नहीं राहें मेरी हों फूलों की ,
फिर भी बिन जूतों के काँटों पे न जाया जायेगा ॥
हाथ न जोड़े कभी जिसने ख़ुदा के सामने ,
उस से क्या आदम के दर पर सर झुकाया जायेगा ?
ख़ूबरू न नौजवाँ , न नामचीं , न रईस मैं ,
किस बिना पर उस हसीं का दिल चुराया जायेगा ?
बस यूँ ही करले यकीं दिल में तेरी तस्वीर है ,
चीर कर दिल को भला कैसे दिखाया जायेगा ?
मुल्क़ से बेरोज़गारी में ये हिज़रत के ख़याल !
प्यार यूँ कब तक वतन से रह निभाया जायेगा ?
भैंस से लेने चले हो दाद तुम भी बीन की ,
स्वाद क्या अदरख का बंदर से बताया जायेगा ?
मर चुका था वो तो अंदर से बहुत पहले मगर ,
आज दम निकला है उसका अब जलाया जायेगा ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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