114 : मुक्त-ग़ज़ल - चाहता हूँ कि ग़म में भी..............


चाहता हूँ कि ग़म में भी रोओ न तुम ॥
पर ख़ुशी में भी बेफ़िक्र होओ न तुम ॥
कुछ तो काँटे भी रखते हैं माक़ूलियत ,
फूल ही फूल खेतों में बोओ न तुम ॥
रोज़ लुटता है आँखों से काजल यहाँ ,
इस जगह बेख़बर होके सोओ न तुम ॥
जिससे तुम हो उसी से हैं सब ग़मज़दा ,
फिर अकेले अकेले ही रोओ न तुम ॥
जिसने तुमको जुबां से भुला रख दिया ,
उसकी यादों में आकण्ठ खोओ न तुम ॥
माना दुश्मन का है , है मगर हार ये ,
इसमें काँटे नुकीले पिरोओ न तुम ॥
दब ही जाओ , कुचल जाओ , मर जाओ तुम ,
बोझ ढोओ पर इतना भी ढोओ न तुम ॥
लोग चलनी ही हमको समझने लगें ,
इतने भी हममें नश्तर चुभोओ न तुम ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज शनिवार (25-01-2014) को "क़दमों के निशां" : चर्चा मंच : चर्चा अंक : 1503 में "अद्यतन लिंक" पर भी है!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
सभी शेर बेहतरीन, दाद स्वीकारें.
धन्यवाद ! डॉ. जेन्नी शबनम जी !
wah bahut khubasurat gajal aapki,,,
धन्यवाद ! Mohan Srivastava Poet जी !

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