113 : मुक्त-ग़ज़ल - सूर्य सा उनको................


सूर्य सा उनको जगमगाने दो ॥
दीप सा हमको टिमटिमाने दो ॥
रू हमारा बिगड़ गया यारों ,
आइने घर के सब हटाने दो ॥
जह्र यूँ ही तो हम न खाएँगे ,
पहले मरने के कुछ बहाने दो ॥
आज बर्बाद है हुआ दुश्मन ,
जश्न जमकर बड़ा मनाने दो ॥
दर्दे दिल कोई फिर उभरता है ,
हमको जी भर के रोने गाने दो ॥
हमको रहना नहीं है जन्नत में,
आपके दिल में घर बनाने दो ॥
ख़ून हमारा अगर सफ़ेद हुआ ,
उसको नाली में झट बहाने दो ॥
वो जो सोये हैं खोलकर आँखें ,
उनको झकझोर कर जगाने दो ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (20-01-2014) को चर्चा कथा में चर्चाकथा "अद्भुत आनन्दमयी बेला" (चर्चा मंच अंक-1498) पर भी होगी!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
Kaushal Lal said…
वाह, बहुत सुन्दर..
बहुत सुंदर ...
धन्यवाद ! Mukesh Kumar Sinha जी !

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