112 : मुक्त-ग़ज़ल - झुकने नहीं मैं टूटने..................


झुकने नहीं मैं टूटने तैयार हूँ जनाब ॥
मग़रूर नहीं थोड़ा सा खुद्दार हूँ जनाब ॥
मंजिल पे भी न आके सफ़र ख़त्म हो मेरा ,
चलने के शौक से बड़ा नाचार हूँ जनाब ॥
मत देखिए चेहरे की चमक मुस्कुराहटें ,
अंदर से टुकड़ा-टुकड़ा हूँ बीमार हूँ जनाब ॥
रहता हूँ इस तरह कि लोग मानते नहीं ,
लेकिन ये सच है फ़ालतू बेकार हूँ जनाब ॥
इक-इक अदा पे आपकी गिनकर बताऊँ क्या ?
मैं इक दफ़ा फ़िदा न सौ-सौ बार हूँ जनाब ॥
कमज़ोरियाँ बदन की लड़खड़ा रहीं मुझे ,
लोगों को मैं पहुँचा हुआ मैख़्वार हूँ जनाब ॥
हों मुझको गिराने के इंतज़ाम बेवजह ,
दिखता खड़ा हूँ अस्ल में मिस्मार हूँ जनाब ॥
खोटा समझ के फेंक न पाओगे मुझको तुम ,
रुपया नहीं हूँ क़ीमती दीनार हूँ जनाब ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

पढ कर बस यही निकला मन से कि
आपकी लेखनी को पढने का तलबगार हूं जनाब
बहुत बहुत धन्यवाद ! अजय कुमार झा जी !
sk dubey said…
bahut khoooooob sir ji....
बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज बुधवार (15-01-2014) को हरिश्चंद का पूत, किन्तु अनुभव का टोटा; चर्चा मंच 1493 में "मयंक का कोना" पर भी है!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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मकर संक्रान्ति (उत्तरायणी) की शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
बहुत सुन्दर !
मकर संक्रान्ति की शुभकामनाएं !
नई पोस्ट हम तुम.....,पानी का बूंद !
नई पोस्ट बोलती तस्वीरें !
धन्यवाद ! कालीपद प्रसाद जी !
Yoginder Singh said…
बहुत ही सुंदर और शानदार ...............................
धन्यवाद ! Yoginder Singh जी !

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