111 : मुक्त-ग़ज़ल - जो न कह पाया जुबाँ से..............

जो न कह पाया जुबाँ से ख़त में सब लिखना पड़ा रे ॥
अपना इज़हारे-तमन्ना आख़िरश करना पड़ा रे 
इश्क़ के तो मैं हमेशा था ख़िलाफ़ अब क्या कहूँ ? सच ,
उनपे मुझ जैसों को भी देखा तो बस मरना पड़ा रे 
सच की सीढ़ी मुझको कुछ टेढ़ी तो कुछ नीची लगी जब ,
खूब ऊँचा चढ़ने को नीचे बहुत गिरना पड़ा रे 
दुश्मनों से तो लड़ा बेखौफ़ हो ताज़िंदगी मैं ,
आस्तीं के साँपों से पल-पल मुझे डरना पड़ा रे 
क्योंकि वो मेरा था अपना था अज़ीज़ों इसलिए तो ,
उस कमीने उस लफ़ंगे को वली कहना पड़ा रे 
सिर्फ़ औलादों के मुस्तक़्बिल के याँ मद्देनज़र ही ,
दुश्मनों से दोस्ताना उम्र भर रखना पड़ा रे 
दूसरा कोई न मिल पाया तो वो ही काम फिर से ,
जिसको ठोकर पर रखा झक मारकर करना पड़ा रे 
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज रविवार (12-01-2014) को वो 18 किमी का सफर...रविवारीय चर्चा मंच....चर्चा अंक:1490
में "मयंक का कोना"
पर भी है!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
shishirkumar said…
vahvah khub kahi yah gazal , Dr sahub.
Harsh Tripathi said…
बहुत सुन्दर !!
धन्यवाद ! Harsh Tripathi जी !

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