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Showing posts from January, 2014

*मुक्त-मुक्तक : 462 - कर लूँ गुनाह मैं भी..................

कर लूँ गुनाह मैं भी अगर कुछ मज़ा मिले ॥ फिर उसमें भी हो लुत्फ़ जो मुझको सज़ा मिले ॥ यों ही मैं क्यों करूँ कोई क़ुसूर कि जिसमें , बेसाख्ता हों होश फ़ाख्ता क़ज़ा मिले ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 461 - इक भी बेदिल से नहीं...............

इक भी बेदिल से नहीं सब ही रज़ा कर लिखिये ॥ लफ़्ज़-दर-लफ़्ज़ समझ-सोच-बजा कर लिखिये ॥ डायरी ख़ुद की कभी आम भी हो सकती है , दिल के जज़्बात शायरी में सजा कर लिखिये ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

मज़्नूँ होने वाले हैं ॥

तुझ यादों में  रह-रह ,रुक-रुक , हँस-हँस रोने वाले हैं ॥ शब-शब ,पल-पल  करवट ले-ले  जग-जग सोने वाले हैं ॥ हममेंकितनी  दिलचस्पी तू  जाने रखती है पर हम , तुझको अपनी  लैला माने  मज़्नूँ होने वाले हैं ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

115 : मुक्त-ग़ज़ल - आज तो कुछ भी नहीं.................

आज तो कुछ भी नहीं मुझसे छिपाया जायेगा ॥ बोझ राज़-ए-दिल का अब न और उठाया जायेगा ॥ मैं तमन्नाई नहीं राहें मेरी हों फूलों की , फिर भी बिन जूतों के काँटों पे न जाया जायेगा ॥ हाथ न जोड़े कभी जिसने ख़ुदा के सामने , उस से क्या आदम के दर पर सर झुकाया जायेगा ? ख़ूबरू न नौजवाँ , न नामचीं , न रईस मैं , किस बिना पर उस हसीं का दिल चुराया जायेगा ? बस यूँ ही करले यकीं दिल में तेरी तस्वीर है , चीर कर दिल को भला कैसे दिखाया जायेगा ? मुल्क़ से बेरोज़गारी में ये हिज़रत के ख़याल ! प्यार यूँ कब तक वतन से रह निभाया जायेगा ? भैंस से लेने चले हो दाद तुम भी बीन की , स्वाद क्या अदरख का बंदर से बताया जायेगा ? मर चुका था वो तो अंदर से बहुत पहले मगर , आज दम निकला है उसका अब जलाया जायेगा ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 460 - मैं बेक़सूर हूँ मैं ..............

मैं बेक़सूर हूँ मैं गुनहगार नहीं हूँ ॥ हरगिज़ किसी सज़ा का मैं हक़दार नहीं हूँ ॥ चुभते हों जिनको फूल उनकी नाजुकी ग़लत , मैं नर्म-नर्म गुल हूँ कड़क ख़ार नहीं हूँ ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 459 - आबे ज़मज़म समझ के............

आबे ज़मज़म समझ के जह्र पिये जाता हूँ ॥
बस ख़ुदा तेरी ही दम पे मैं जिये जाता हूँ ॥
ज़िंदगी यूँ तो है दुश्वार मेरी सख़्त से सख़्त,
नाम रट-रट के तेरा सह्ल किये जाता हूँ ( सह्ल = सरल , सुगम , आसान )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 458 - बहुत सी पास में खुशियाँ............

बहुत सी पास में खुशियाँ हों या इफ़्रात में ग़म-वम , कि रेगिस्तान हो दिल में या क़ामिल आब-ए-ज़मज़म , तज़ुर्बा है मेरा ज़ाती ये ज़ाती सोच है मेरी - कि शायर की क़लम में तब ही आ पाता है दम-ख़म ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 457 - और भी ज़्यादा निगाहों..........

और भी ज़्यादा निगाहों में लगो छाने ॥ दिल मचल उठता है तब तो और भी आने ॥ जब भी ये लगता है लगने मुझको शिद्दत से , अजनबी हो तुम , पराये तुम , हो बेगाने ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 456 - हिमाक़त ऐसी तनहाई में................

हिमाक़त ऐसी तनहाई में बारंबार कर बैठो ॥ मेरा तब सिर से लेकर पैर तक दीदार कर बैठो ॥ कभी मैं हुस्न जब भी बेख़बर सो जाऊँ बेपर्दा , तुम आकर इश्क़ फ़ौरन बेइजाज़त प्यार कर बैठो ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

114 : मुक्त-ग़ज़ल - चाहता हूँ कि ग़म में भी..............

चाहता हूँ कि ग़म में भी रोओ न तुम ॥ पर ख़ुशी में भी बेफ़िक्र होओ न तुम ॥ कुछ तो काँटे भी रखते हैं माक़ूलियत , फूल ही फूल खेतों में बोओ न तुम ॥ रोज़ लुटता है आँखों से काजल यहाँ , इस जगह बेख़बर होके सोओ न तुम ॥ जिससे तुम हो उसी से हैं सब ग़मज़दा , फिर अकेले अकेले ही रोओ न तुम ॥ जिसने तुमको जुबां से भुला रख दिया , उसकी यादों में आकण्ठ खोओ न तुम ॥ माना दुश्मन का है , है मगर हार ये , इसमें काँटे नुकीले पिरोओ न तुम ॥ दब ही जाओ , कुचल जाओ , मर जाओ तुम , बोझ ढोओ पर इतना भी ढोओ न तुम ॥ लोग चलनी ही हमको समझने लगें , इतने भी हममें नश्तर चुभोओ न तुम ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 455 - कैसी-कैसी मीठी-मीठी...............

कैसी-कैसी मीठी-मीठी प्यारी-प्यारी करती थी ॥ क्या दिन-दिन क्या रात-रात भर ढेरों-सारी करती थी ॥ मेरी तरफ़ मुखातिब होना तक न गवारा आज उसे , जो मुझसे जज़्बात की बातें भारी-भारी करती थी ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 454 - बेशक़ दिखने में मैं नाजुक............

बेशक़ दिखने में मैं नाजुक-चिकनी-गोरी-चिट्टी हूँ ॥ लेकिन ये हरगिज़ मत समझो नर्म-भुरभुरी-मिट्टी हूँ ॥ चाहो तो दिन-रात देखलो मुझपे करके बारिश तुम , मैं न गलूँगी क़सम तुम्हारी ! अंदर से मैं गिट्टी हूँ ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 453 - सितमगर की वो कब................

सितमगर की वो कब आकर के करता है गिरफ़्तारी ? कहे से और उल्टे उसकी करता है तरफ़दारी ॥ वो थानेदार बस चेहरे से है ईमान का पुतला , निभाकर फ़र्ज़ न अपना यों करता है सितमगारी ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 452 - रहूँ प्यासा गुलू में...................

रहूँ प्यासा गुलू में चाहे क़तरा आब न जाये ॥ तुम्हारे इश्क़ में जलने की मेरी ताब न जाये ॥ नहीं क़ाबिल मैं हरगिज़ भी तुम्हारे पर दुआ इतनी , तुम्हें पाने का आँखों से कभी भी ख़्वाब न जाये ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 451 - बेवजह वो मुझसे..................

बेवजह वो मुझसे बरहम हो रही है ॥ हर मसर्रत मेरी मातम हो रही है ॥ कर रही है जिस तरह वो बदसुलूकी, रफ़्ता-रफ़्ता ज़िंदगी कम हो रही है ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 450 -न जाने क्यों ख़ामोशी भी................

न जाने क्यों ख़ामोशी भी शोर-शराबा लगती है ? मरहम-पट्टी-ख़िदमतगारी ख़ून-खराबा लगती है ॥ ख़ुद का जंगल उनको शाही-बाग़ से बढ़कर लगता है , मेरी बगिया नागफणी का सह्रा-गाबा लगती है ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

113 : मुक्त-ग़ज़ल - सूर्य सा उनको................

सूर्य सा उनको जगमगाने दो ॥ दीप सा हमको टिमटिमाने दो ॥ रू हमारा बिगड़ गया यारों , आइने घर के सब हटाने दो ॥ जह्र यूँ ही तो हम न खाएँगे , पहले मरने के कुछ बहाने दो ॥ आज बर्बाद है हुआ दुश्मन , जश्न जमकर बड़ा मनाने दो ॥ दर्दे दिल कोई फिर उभरता है , हमको जी भर के रोने गाने दो ॥ हमको रहना नहीं है जन्नत में, आपके दिल में घर बनाने दो ॥ ख़ून हमारा अगर सफ़ेद हुआ , उसको नाली में झट बहाने दो ॥ वो जो सोये हैं खोलकर आँखें , उनको झकझोर कर जगाने दो ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 449 - वो ज़माने गये जो थे.................

वो ज़माने गये जो थे किसी ज़माने में ॥ लोग महबूब को थकते न थे मनाने में ॥ सख़्त जोखिम भरी है आज रूठने की अदा , यार लग जाएँ नये यार झट बनाने में ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 448 - आज राजा के जैसा............

आज राजा के जैसा मुझको रंक लगता है ॥ पाँव चींटे का भी मराल-पंख लगता है ॥ इतना हर्षित हूँ काँव-काँव कुहुक लगती है , रेंकना गदहों का मंदिर का शंख लगता है ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 447 - सोने-चाँदी के जो...................

सोने-चाँदी के जो क़ाबिल हैं ;हैं जो मतवाले ॥ कोयलेउनको मिले लोहे भी धूसर काले ॥ है ये क़िस्मत भी अजब चीज़चमेली वाला , तेल मल-मल के छछूंदर के मगज पे डाले ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 446 - चाहे वो गंगा का हो.................

चाहे वो गंगा का हो सिंध या चनाब का ॥ इस वक़्त वो प्यासा है तो दरिया के आब का ॥ बेशक़ तड़प तड़प के मर भी जाएगा मगर , प्याला नहीं लगाएगा मुँह से शराब का ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 445 - क्या फ़ायदा कि चुप हो......................

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क्या फ़ायदा कि चुप हो गज भर ज़बान रखकर ? सुनते नहीं अगर तुम हाथी से कान रखकर ॥ आँखें हैं पर न देखो , सिर धर के गर न सोचो ! फिर तुम तो चलता फिरता मुर्दा हो जान रखकर ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

112 : मुक्त-ग़ज़ल - झुकने नहीं मैं टूटने..................

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झुकने नहीं मैं टूटने तैयार हूँ जनाब ॥ मग़रूर नहीं थोड़ा सा खुद्दार हूँ जनाब ॥ मंजिल पे भी न आके सफ़र ख़त्म हो मेरा , चलने के शौक से बड़ा नाचार हूँ जनाब ॥ मत देखिए चेहरे की चमक मुस्कुराहटें , अंदर से टुकड़ा-टुकड़ा हूँ बीमार हूँ जनाब ॥ रहता हूँ इस तरह कि लोग मानते नहीं , लेकिन ये सच है फ़ालतू बेकार हूँ जनाब ॥ इक-इक अदा पे आपकी गिनकर बताऊँ क्या ? मैं इक दफ़ा फ़िदा न सौ-सौ बार हूँ जनाब ॥ कमज़ोरियाँ बदन की लड़खड़ा रहीं मुझे , लोगों को मैं पहुँचा हुआ मैख़्वार हूँ जनाब ॥ हों मुझको गिराने के इंतज़ाम बेवजह , दिखता खड़ा हूँ अस्ल में मिस्मार हूँ जनाब ॥ खोटा समझ के फेंक न पाओगे मुझको तुम , रुपया नहीं हूँ क़ीमती दीनार हूँ जनाब ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 444 - जो कुछ बजा न हो..................

जो कुछ बजा न हो वो भी वाज़िब है बजा है ॥ वो हों तो दर्द लुत्फ़ है ग़म एक मज़ा है ॥ उनके बग़ैर क़ैद है बख़ुदा रिहाई भी , इनआम भी जुर्माना है इक सख़्त सज़ा है ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 443 - दो घूँट में ही वो...............

दो घूँट में ही वो नशे से रह भटक गये ॥ दो मार के डग बीच में अटक सटक गये ॥ मंजिल पे भी हमें मिली न दौड़ से फुर्सत , टाले टले न होश ख़ुम के ख़ुम गटक गये ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 442 - यक़ीनन वो नहीं मेरा.................

यक़ीनन वो नहीं मेरा असल मक़सद मेरी मंजिल ॥ न मैं कोई डूबती कश्ती न वो ही नाख़ुदा-साहिल ॥ नहीं होता मुझे बर्दाश्त हरगिज़ भी गुरूर उनका , लिहाजा उनको करना है मुझे हर हाल में हासिल ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 441 - तवील बेशक़ न लेक कुछ तो.......

तवील बेशक़ न लेक कुछ तो ज़रा-ज़रा , कम ही कम सुनाने ॥ किये जो मुझ पर जहाँ ने तारी वो सारे गिन-गिन सितम सुनाने ॥ हर एक दर्दआशना जो सुन-सुन न अश्क़ ढा दे अगर तो कहना , बुला कभी मुझको अपनी महफ़िल में मेरी रुदाद-ए-ग़म सुनाने ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

111 : मुक्त-ग़ज़ल - जो न कह पाया जुबाँ से..............

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जो न कह पाया जुबाँ से ख़त में सब लिखना पड़ा रे ॥ अपना इज़हारे-तमन्ना आख़िरश करना पड़ा रे  इश्क़ के तो मैं हमेशा था ख़िलाफ़ अब क्या कहूँ ? सच , उनपे मुझ जैसों को भी देखा तो बस मरना पड़ा रे  सच की सीढ़ी मुझको कुछ टेढ़ी तो कुछ नीची लगी जब , खूब ऊँचा चढ़ने को नीचे बहुत गिरना पड़ा रे  दुश्मनों से तो लड़ा बेखौफ़ हो ताज़िंदगी मैं , आस्तीं के साँपों से पल-पल मुझे डरना पड़ा रे  क्योंकि वो मेरा था अपना था अज़ीज़ों इसलिए तो , उस कमीने उस लफ़ंगे को वली कहना पड़ा रे  सिर्फ़ औलादों के मुस्तक़्बिल के याँ मद्देनज़र ही , दुश्मनों से दोस्ताना उम्र भर रखना पड़ा रे  दूसरा कोई न मिल पाया तो वो ही काम फिर से , जिसको ठोकर पर रखा झक मारकर करना पड़ा रे  -डॉ. हीरालाल प्रजापति