Friday, January 31, 2014

*मुक्त-मुक्तक : 462 - कर लूँ गुनाह मैं भी..................


कर लूँ गुनाह मैं भी अगर कुछ मज़ा मिले ॥
फिर उसमें भी हो लुत्फ़ जो मुझको सज़ा मिले ॥
यों ही मैं क्यों करूँ कोई क़ुसूर कि जिसमें ,
बेसाख्ता हों होश फ़ाख्ता क़ज़ा मिले ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Thursday, January 30, 2014

*मुक्त-मुक्तक : 461 - इक भी बेदिल से नहीं...............


इक भी बेदिल से नहीं सब ही रज़ा कर लिखिये ॥
लफ़्ज़-दर-लफ़्ज़ समझ-सोच-बजा कर लिखिये ॥
डायरी ख़ुद की कभी आम भी हो सकती है ,
दिल के जज़्बात शायरी में सजा कर लिखिये ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Wednesday, January 29, 2014

मज़्नूँ होने वाले हैं ॥






तुझ यादों में 
रह-रह ,रुक-रुक ,
हँस-हँस रोने वाले हैं ॥
शब-शब ,पल-पल 
करवट ले-ले 
जग-जग सोने वाले हैं ॥
हममें कितनी 
दिलचस्पी तू 
जाने रखती है पर हम ,
तुझको अपनी 
लैला माने 
मज़्नूँ होने वाले हैं ॥


-डॉ. हीरालाल प्रजापति

115 : ग़ज़ल - आज तो कुछ भी नहींं


आज तो कुछ भी नहीं मुझसे छिपाया जाएगा ।।
राज़-ए-दिल का बोझ अब ना और उठाया जाएगा ।।1।।
मैं तमन्नाई नहीं राहें मेरी फूलों की हों ,
हाँ बिना जूतों के काँटों पे न जाया जाएगा ।।2।।
हाथ भी जोड़े न वो जो सच ख़ुदा के सामने ,
उस से क्या इंसाँ के दर पे सर झुकाया जाएगा ?3।।
ख़ूबरू ना नौजवाँ , ना नामचीं , न रईस मैं ,
उस हसीं का किस बिना पर दिल चुराया जाएगा ?4।।
बस यूँ ही करले यकीं दिल में तेरी तस्वीर है ,
चीर कर दिल को भला कैसे दिखाया जाएगा ?5।।
मुल्क़ से बेरोज़गारी में ये हिज़रत के ख़याल ,
प्यार यूँ कब तक वतन से रह निभाया जाएगा ?6।।
भैंस से लेने चले हो दाद तुम भी बीन की ,
स्वाद क्या अदरख का बंदर से बताया जाएगा ?7।।
मर चुका था वो तो अंदर से बहुत पहले मगर ,
आज तन से भी गया दम तो जलाया जाएगा ।।8।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Tuesday, January 28, 2014

*मुक्त-मुक्तक : 460 - मैं बेक़सूर हूँ मैं ..............


मैं बेक़सूर हूँ मैं गुनहगार नहीं हूँ ॥
हरगिज़ किसी सज़ा का मैं हक़दार नहीं हूँ ॥
चुभते हों जिनको फूल उनकी नाजुकी ग़लत ,
मैं नर्म-नर्म गुल हूँ कड़क ख़ार नहीं हूँ ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 459 - आबे ज़मज़म समझ के............


आबे ज़मज़म समझ के जह्र पिये जाता हूँ ॥

बस ख़ुदा तेरी ही दम पे मैं जिये जाता हूँ ॥

ज़िंदगी यूँ तो है दुश्वार मेरी सख़्त से सख़्त ,

नाम रट-रट के तेरा सह्ल किये जाता हूँ 
( सह्ल = सरल , सुगम , आसान )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Sunday, January 26, 2014

*मुक्त-मुक्तक : 458 - बहुत सी पास में खुशियाँ............


बहुत सी पास में खुशियाँ हों या इफ़्रात में ग़म-वम ,
कि रेगिस्तान हो दिल में या क़ामिल आब-ए-ज़मज़म ,
तज़ुर्बा है मेरा ज़ाती ये ज़ाती सोच है मेरी -
कि शायर की क़लम में तब ही आ पाता है दम-ख़म ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 457 - और भी ज़्यादा निगाहों..........


और भी ज़्यादा निगाहों में लगो छाने ॥
दिल मचल उठता है तब तो और भी आने ॥
जब भी ये लगता है लगने मुझको शिद्दत से ,
अजनबी हो तुम , पराये तुम , हो बेगाने ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Saturday, January 25, 2014

*मुक्त-मुक्तक : 456 - हिमाक़त ऐसी तनहाई में................


हिमाक़त ऐसी तनहाई में बारंबार कर बैठो ॥
मेरा तब सिर से लेकर पैर तक दीदार कर बैठो ॥
कभी मैं हुस्न जब भी बेख़बर सो जाऊँ बेपर्दा ,
तुम आकर इश्क़ फ़ौरन बेइजाज़त प्यार कर बैठो ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Friday, January 24, 2014

114 : ग़ज़ल - चाहता हूँ कि ग़म में भी


चाहता हूँ कि ग़म में भी रोओ न तुम ।।
पर ख़ुशी में भी बेफ़िक्र होओ न तुम ।।1।।
कुछ तो काँटे भी रखते हैं माक़ूलियत ,
फूल ही फूल खेतों में बोओ न तुम ।।2।।
रोज़ लुटता है आँखों से काजल यहाँ ,
इस जगह बेख़बर होके सोओ न तुम ।।3।।
जिससे तुम हो उसी से हैं सब ग़मज़दा ,
फिर अकेले-अकेले ही रोओ न तुम ।।4।।
याद से जिसने तुमको भुला रख दिया ,
भूल से उसकी यादों में खोओ न तुम ।।5।।
माना दुश्मन का है , है मगर हार ये ,
इसमें फूलों से काँटे पिरोओ न तुम ।।6।।
दब ही जाओ , कुचल जाओ , मर जाओ सच ,
बोझ ढोओ ; पर इतना भी ढोओ न तुम ।।7।।
लोग चलनी ही हमको समझने लगें ,
इतने भी हममें नश्तर चुभोओ न तुम ।।8।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Thursday, January 23, 2014

*मुक्त-मुक्तक : 455 - कैसी-कैसी मीठी-मीठी...............


कैसी-कैसी मीठी-मीठी प्यारी-प्यारी करती थी ॥
क्या दिन-दिन क्या रात-रात भर ढेरों-सारी करती थी ॥
मेरी तरफ़ मुखातिब होना तक न गवारा आज उसे ,
जो मुझसे जज़्बात की बातें भारी-भारी करती थी ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 454 - बेशक़ दिखने में मैं नाजुक............


बेशक़ दिखने में मैं नाजुक-चिकनी-गोरी-चिट्टी हूँ ॥
लेकिन ये हरगिज़ मत समझो नर्म-भुरभुरी-मिट्टी हूँ ॥
चाहो तो दिन-रात देखलो मुझपे करके बारिश तुम ,
मैं न गलूँगी क़सम तुम्हारी ! अंदर से मैं गिट्टी हूँ ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Wednesday, January 22, 2014

*मुक्त-मुक्तक : 453 - सितमगर की वो कब................


सितमगर की वो कब आकर के करता है गिरफ़्तारी ?
कहे से और उल्टे उसकी करता है तरफ़दारी ॥
वो थानेदार बस चेहरे से है ईमान का पुतला ,
निभाकर फ़र्ज़ न अपना यों करता है सितमगारी ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Tuesday, January 21, 2014

*मुक्त-मुक्तक : 452 - रहूँ प्यासा गुलू में...................


रहूँ प्यासा गुलू में चाहे क़तरा आब न जाये ॥
तुम्हारे इश्क़ में जलने की मेरी ताब न जाये ॥
नहीं क़ाबिल मैं हरगिज़ भी तुम्हारे पर दुआ इतनी ,
तुम्हें पाने का आँखों से कभी भी ख़्वाब न जाये ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Monday, January 20, 2014

*मुक्त-मुक्तक : 451 - बेवजह वो मुझसे..................


बेवजह वो मुझसे बरहम हो रही है ॥
हर मसर्रत मेरी मातम हो रही है ॥
कर रही है जिस तरह वो बदसुलूकी,
रफ़्ता-रफ़्ता ज़िंदगी कम हो रही है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Sunday, January 19, 2014

*मुक्त-मुक्तक : 450 -न जाने क्यों ख़ामोशी भी................


न जाने क्यों ख़ामोशी भी शोर-शराबा लगती है ?
मरहम-पट्टी-ख़िदमतगारी ख़ून-खराबा लगती है ॥
ख़ुद का जंगल उनको शाही-बाग़ से बढ़कर लगता है ,
मेरी बगिया नागफणी का सह्रा-गाबा लगती है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

113 : ग़ज़ल - सूर्य सा उनको जगमगाने दो


सूर्य सा उनको जगमगाने दो ।।
दीप सा हमको टिमटिमाने दो ।।1।।
सूरत अपनी बिगड़ गयी यारों ,
आइने घर के सब हटाने दो ।।2।।
ज़ह्र यूँ ही तो हम न खाएँगे ,
मरने के कुछ न कुछ बहाने दो ।।3।।
आज बरबाद हो गया दुश्मन ,
जश्न जमकर बड़ा मनाने दो ।।4।।
दर्दे दिल कोई फिर उभरता है ,
हमको जी भर के रोने गाने दो ।।5।।
हमको रहना नहीं है जन्नत में,
आपके दिल में घर बनाने दो ।।6।।
ख़ून अपना सफ़ेद है शायद ,
लाल करने इसे बहाने दो ।।7।।
वो जो सोये हैं खोलकर आँखें ,
उनको झकझोर कर जगाने दो ।।8।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Saturday, January 18, 2014

*मुक्त-मुक्तक : 449 - वो ज़माने गये जो थे.................


वो ज़माने गये जो थे किसी ज़माने में ॥
लोग महबूब को थकते न थे मनाने में ॥
सख़्त जोखिम भरी है आज रूठने की अदा ,
यार लग जाएँ नये यार झट बनाने में ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Friday, January 17, 2014

*मुक्त-मुक्तक : 448 - आज राजा के जैसा............


आज राजा के जैसा मुझको रंक लगता है ॥
पाँव चींटे का भी मराल-पंख लगता है ॥
इतना हर्षित हूँ काँव-काँव कुहुक लगती है ,
रेंकना गदहों का मंदिर का शंख लगता है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 447 - सोने-चाँदी के जो...................


सोने-चाँदी के जो क़ाबिल हैं ; हैं जो मतवाले ॥
कोयले उनको मिले लोहे भी धूसर काले ॥
है ये क़िस्मत भी अजब चीज़ चमेली वाला ,
तेल मल-मल के छछूंदर के मगज पे डाले ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Thursday, January 16, 2014

*मुक्त-मुक्तक : 446 - चाहे वो गंगा का हो.................


चाहे वो गंगा का हो सिंध या चनाब का ॥
इस वक़्त वो प्यासा है तो दरिया के आब का ॥
बेशक़ तड़प तड़प के मर भी जाएगा मगर ,
प्याला नहीं लगाएगा मुँह से शराब का ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Wednesday, January 15, 2014

*मुक्त-मुक्तक : 445 - क्या फ़ायदा कि चुप हो......................

क्या फ़ायदा कि चुप हो गज भर ज़बान रखकर ?
सुनते नहीं अगर तुम हाथी से कान रखकर ॥
आँखें हैं पर न देखो , सिर धर के गर न सोचो !
फिर तुम तो चलता फिरता मुर्दा हो जान रखकर ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Tuesday, January 14, 2014

112 : ग़ज़ल - झुकने नहीं मैं टूटने




झुकने नहीं मैं टूटने तैयार हूँ जनाब ।।
मग़रूर तो नहीं हूँ ; हाँ ! ख़ुद्दार हूँ जनाब ।।1।।
मंजिल पे भी तो आ के न मेरा सफ़र हो ख़त्म ,
चलने के सख़्त शौक़ से नाचार हूँ जनाब ।।2।।
मत देखो नूर चेहरे का मेरे न हँसते होंठ ,
रंजूर हूँ , सियाह हूँ , बीमार हूँ जनाब ।।3।।
रहता हूँ इस तरह से कि कब मानते हैं लोग ,
इक अर्से से मैं फ़ालतू बेकार हूँ जनाब ।।4।।
इक-इक अदा पे आपकी पूछो न कितनी बार ?
सच इक दफ़ा फ़िदा न मैं सौ बार हूँ जनाब ।।5।।
कमज़ोरियाँ बदन की मुझे लड़खड़ा गिराएँ ,
लोगों को लग रहा कि मैं मैख़्वार हूँ जनाब ।।6।।
क्यों होते मुझको रोज़ गिराने के इंतिज़ाम ,
दिखता खड़ा हूँ अस्ल में मिस्मार हूँ जनाब ।।7।।
खोटा समझ कभी भी न पाओगे मुझको फेंक ,
रुपया नहीं हूँ सोन की दीनार हूँ जनाब ।।8।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 444 - जो कुछ बजा न हो..................


जो कुछ बजा न हो वो भी वाज़िब है बजा है ॥
वो हों तो दर्द लुत्फ़ है ग़म एक मज़ा है ॥
उनके बग़ैर क़ैद है बख़ुदा रिहाई भी ,
इनआम भी जुर्माना है इक सख़्त सज़ा है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 443 - दो घूँट में ही वो...............


दो घूँट में ही वो नशे से रह भटक गये ॥
दो मार के डग बीच में अटक सटक गये ॥
मंजिल पे भी हमें मिली न दौड़ से फुर्सत ,
टाले टले न होश ख़ुम के ख़ुम गटक गये ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Sunday, January 12, 2014

*मुक्त-मुक्तक : 442 - यक़ीनन वो नहीं मेरा.................


यक़ीनन वो नहीं मेरा असल मक़सद मेरी मंजिल ॥
न मैं कोई डूबती कश्ती न वो ही नाख़ुदा-साहिल ॥
नहीं होता मुझे बर्दाश्त हरगिज़ भी गुरूर उनका ,
लिहाजा उनको करना है मुझे हर हाल में हासिल ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 441 - तवील बेशक़ न लेक कुछ तो.......


तवील बेशक़ न लेक कुछ तो ज़रा-ज़रा , कम ही कम सुनाने ॥
किये जो मुझ पर जहाँ ने तारी वो सारे गिन-गिन सितम सुनाने ॥
हर एक दर्दआशना जो सुन-सुन न अश्क़ ढा दे अगर तो कहना ,
बुला कभी मुझको अपनी महफ़िल में मेरी रुदाद-ए-ग़म सुनाने ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Saturday, January 11, 2014

111 : ग़ज़ल - जो न कह पाया जुबाँ से



जो न कह पाया जुबाँ से ख़त में सब लिखना पड़ा ।।
अपना इज़हारे-तमन्ना आख़िरश करना पड़ा ।।1।।
इश्क़ के यों था हमेशा मैं ख़िलाफ़ अब क्या कहूँ ,
उनपे , मुझ जैसों को भी , तकते ही बस मरना पड़ा ।।2।।
सच का ज़ीना सच ख़तरनाक और नीचा सा लगा ,
थोड़ा ऊँचा चढ़ने को मुझको बहुत गिरना पड़ा ।।3।।
दुश्मनों से तो लड़ा बेखौफ़ हो ताज़िंदगी ,
आस्तीं के साँपों से पल-पल मुझे डरना पड़ा ।।4।।
क्योंकि वो मेरा था अपना था अज़ीज़ों इसलिए ,
उस कमीने , उस लफ़ंगे को वली कहना पड़ा ।।5।।
सिर्फ़ औलादों के मुस्तक़्बिल के ही मद्देनज़र ,
दुश्मनों से दोस्ताना उम्र भर रखना पड़ा ।।6।।
दूसरा कोई न मिल पाया तो वो ही काम फिर ,
जिसको ठोकर पर रखा झक मारकर करना पड़ा ।।7।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Friday, January 10, 2014

*मुक्त-मुक्तक :440 - कहाँ अब रात होगी..................


कहाँ अब रात होगी और कहाँ अपनी सहर होगी ?
बग़ैर उनके भटकते ज़िंदगी शायद बसर होगी !
रहेंगे जह्न-ओ-दिल में जब वही हर वक़्त छाये तो ,
हमें कब अपने जीने और मरने की ख़बर होगी ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Thursday, January 9, 2014

*मुक्त-मुक्तक : 439 - रोती-सिसकती क़हक़हों.............


रोती-सिसकती क़हक़हों भरी हँसी लगे ॥
बूढ़ी मरी-मरी जवान ज़िंदगी लगे ॥
इक वहम दिल-दिमाग़ पे तारी है आजकल ,
बिलकुल लटकते साँप सी रस्सी पड़ी लगे ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Wednesday, January 8, 2014

*मुक्त-मुक्तक : 438 - कोई कितना भी हो ग़लीज़............


कोई कितना भी हो ग़लीज़ या कि पाक यहाँ ॥
सबको होना है लेक एक रोज़ ख़ाक यहाँ ॥
ज़िंदगी लाख हो लबरेज़ दर्द-ओ-ग़म से मगर ,
किसको लगती नहीं है मौत खौफ़नाक यहाँ ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

ग़ज़ल : 285 - बदनसीब हरगिज़ न हो

चोर हो , डाकू हो , क़ातिल हो , ग़रीब हरगिज़ न हो ।। आदमी कुछ हो , न हो बस , बदनसीब हरगिज़ न हो ।। ज़िंदगी उस शख़्स की , क्या ज़िंदगी है दो...