*मुक्त-मुक्तक : 430 - सबपे पहले ही से................


सबपे पहले ही से बोझे थे बेशुमार यहाँ ॥
अश्क़ टपकाने लगते सब थे बेक़रार यहाँ ॥
सोचते थे कि होता अपना भी इक दिल ख़ुशकुन
लेकिन ऐसा न मिला हमको ग़मगुसार यहाँ ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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