*मुक्त-मुक्तक : 428 - ज्यों आँखें मलते उठते हो................


ज्यों आँखें मलते उठते हो 
यों ही भीतर से जागो तुम ॥
मैं आईना हूँ अपने सच से 
मत बचकर के भागो तुम ॥
क़सीदे से कहीं उम्दा 
लगे ऐसी रफ़ू मारो ,
फटे दामन को कथरी की 
तरह मत हाय तागो तुम ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (30-12-13) को "यूँ लगे मुस्कराये जमाना हुआ" (चर्चा मंच : अंक-1477) पर भी होगी!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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