*मुक्त-मुक्तक : 426 - तेरी पसंदगी को................


तेरी पसंदगी को सोचकर के कब कहे ?
दिल के ख़याल फ़ौरन औ’’ ज्यों के त्यों सब कहे ॥
ख़ुद के सुकून ख़ुद की तसल्ली की गरज से ,
जितने भी अपनी ग़ज़लों में मैंने क़तब कहे ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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