*मुक्त-मुक्तक : 423 - कई दिन के कुछ इक...................



कई दिन के कुछ इक भूखे 
पड़े कुत्तों को बुलवाना ,
मुझे रख देना उनके सामने 
औ' तुम सब हट जाना ,
मेरी ख़्वाहिश है ठीक ऐसा ही 
करना मैं मरूँ जिस दिन ,
मेरे मुर्दे को मत मदफ़न में 
मेरे यारों दफ़नाना ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शुक्रवार (27-12-13) को "जवानी में थकने लगी जिन्दगी है" (चर्चा मंच : अंक-1474) पर भी होगी!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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क्रिसमस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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