*मुक्त-मुक्तक : 422 - आँखें बारिश न बनें.................


आँखें बारिश न बनें 
क्यों ये मरुस्थल होएँ ? 

जब मशीन हम नहीं तो 
दर्द में  क्यों रोएँ ? 

जब कसक उठती है 
होती है घुटन सीने में ,

क्यों न अपनों से कहें 
ग़म अकेले चुप ढोएँ ? 
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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