*मुक्त-मुक्तक :418 - कैसी रेलमपेल रे................


कैसी रेलमपेल रे भैया कैसी रेलमपेल ॥ 

भीड़मभाड़ से दिखती खाली आज न कोई रेल ॥ 
हर हालत में अपनी मंजिल पाने के बदले ,
जिसको देखो उसको अपनी जाँ से खेले खेल ॥ 
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Comments

Hema Pal said…
बस चार लाइन,हद है कोई तो शिक्षा भी दो
धन्यवाद ! Hema Pal जी ! आप समझदार हैं ।
VINOD SHILLA said…
बहुत सुंदर

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