*मुक्त-मुक्तक : 417 - काँटा कोई नुकीला..............


काँटा कोई नुकीला लगे 
कब कली लगे ?
सच कह रहा हूँ ज़िंदगी न 
अब भली लगे ॥
जब से हुआ है उससे 
हमेशा को बिछुड़ना ,
बारिश भी उसकी सिर क़सम 
अजब जली लगे ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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