*मुक्त-मुक्तक : 415 - कुछ बह्र की , कुछ जंगलों की.........


कुछ बह्र की , कुछ जंगलों की 
आग बने हैं ॥
कुछ शम्अ , कुछ मशाल , कुछ 
चराग़ बने हैं ॥
वो तो बनेगा सिर्फ़ किसी 
एक का मगर ,
उसके फ़िदाई लाखों 
लोग-बाग बने हैं ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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