*मुक्त-मुक्तक : 413 - कपड़े-लत्तों में भी................


कपड़े-लत्तों में भी हूँ नंग-
धड़ंगों की तरह ॥
मेरा कंघा बग़ैर दाँत का , 
गंजों की तरह ॥
दिल-दिमाग़-आँख भी रखने के 
बावजूद अक्सर ,
दर-ब-दर खाता फिरूँ ठोकरें 
अंधों की तरह ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

VINOD SHILLA said…
बहुत सुंदर रचना

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