*मुक्त-मुक्तक : 406 - मेरे सुलझाये ही मुझको.......................


मेरे सुलझाये ही मुझको 
अब इक उलझन समझते हैं ॥
मेरी उँगली पकड़ चलते 
हुए रहजन समझते हैं ॥
किसी ने उनके तौबा-तौबा 
इतने कान भर डाले ,
मेरे पाले मुझे ही जान 
का दुश्मन समझते हैं ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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