*मुक्त-मुक्तक : 403 - निराधार , अनुचित..................


निराधार , अनुचित व अकारण 
मुझ पर रोष
क्यों करते रहते हो ? मढ़कर 
झूठे दोष ॥
शत्रु नहीं तुम मेरे कैसे 
मान लूँ मैं ,
नित्य पिलाते विष कहते हो 
करते पोष ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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