*मुक्त-मुक्तक : 381 - हर एक एक से एक.................


हर एक एक से एक 
बढ़कर लगे है ॥
नज़र को हसीं सबका 
मंजर लगे है ॥
मोहब्बत की दुनिया 
बसाने को लेकिन ,
नहीं कोई दिल 
क़ाबिले घर लगे है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

Popular posts from this blog

विवाह अभिनंदन पत्र

विवाह आभार पत्र

कहानी : एक नास्तिक की तीर्थ यात्रा