*मुक्त-मुक्तक : 388 - वो चमकदार वो रोशन..................


वो चमकदार वो रोशन 
क्यों जुप ही रहता है ?
सामने क्यों नहीं आता है 
लुप ही रहता है ?
बात-बेबात-बात करना 
जिसकी आदत थी ,
क्या हुआ हादसा कि 
अब वो चुप ही रहता है ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

Sriram Roy said…
शानदार और जानदार कविता

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