*मुक्त-मुक्तक : 386 - पाऊँ यही कि सब हैं........................


पाऊँ यही कि सब हैं आम 
कोई भी न ख़ास ॥
कैसा है कौन इसका जब 
लगाऊँ मैं कयास ॥
बाहर से सब ढँके - मुंदे , 
सजे – धजे मगर ,
अंदर हैं आधे नंगे 
या पूरे ही बेलिबास ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

Popular posts from this blog

विवाह अभिनंदन पत्र

विवाह आभार पत्र

मुक्त ग़ज़ल : 267 - तोप से बंदूक