*मुक्त-मुक्तक : 378 - मैं जैसा था पड़ा........................


मैं जैसा था पड़ा वैसा ही 
रहा आता पड़ा ॥
घिसटता रहता न चल सकता 
न हो पाता खड़ा ॥
ये करिश्मा किया 
अहसासे कमतरी ने मेरे ,
जो बन सका मैं छोटे से 
बड़े बडों से बड़ा ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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