*मुक्त-मुक्तक : 371 - अज़ीम शख़्स था.......................


अज़ीम शख़्स था 
हक़ीर से जमाने में ॥
लुटेरे सब थे वो 
मशगूल था लुटाने में ॥
हमेशा मैंने चाहा 
उसपे लादना खुशियाँ ,
वलेक उसका तो 
मज़ा था ग़म उठाने में ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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