*मुक्त-मुक्तक : 368 - पेशानी पे चन्दन - तिलक...................



पेशानी पे चन्दन - तिलक 
लगा रहे हो तुम ॥
क्या दिल के कालेपन को 
यों छिपा रहे हो तुम ?
क्या हो गया है पाप 
कोई ? बार – बार जा ,
गंगा में कभी जमुना में 
नहा रहे हो तुम ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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