*मुक्त-मुक्तक : 362 - छोटे से सिर पे......................


छोटे से सिर पे पत्थरों का 
इक पहाड़ है ॥
ताउम्र को ये ज़िंदगी 
क़ैदे तिहाड़ है ॥
मातम है मसर्रत भी 
तेरे बिन मेरे लिए ,
हर खिलखिलाता बाग़ 
सिसकता उजाड़ है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

सुन्दर प्रस्तुति।
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प्रकाशोत्सव के महापर्व दीपादली की हार्दिक शुभकानाएँ।
धन्यवाद ! रूपचन्द्र शास्त्री मयंक जी ! आपको भी शुभकामना ।

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