108 : मुक्त-ग़ज़ल - दुश्मन का देख ठाठ...................



दुश्मन का देख ठाठ-बाट जल रहा हूँ मैं ॥
वो अर्श पर उड़े ज़मीं पे चल रहा हूँ मैं ॥
गिरते जिधर गिराए से न लोग बाग उधर ,
ठस खुरदुरी ज़मीन पर फिसल रहा हूँ मैं ॥
जब तक लचक थी हड्डियों में मैं नहीं झुका ,
अब सख़्त हैं तो झुकने को मचल रहा हूँ मैं ॥
हालात ने कुछ इस तरह बदल दिया मुझे ,
हालात अपने आजकल बदल रहा हूँ मैं ॥
बेहाल हूँ मैं अपने दर्द से यहाँ वहाँ ,
मारे खुशी के यों नहीं उछल रहा हूँ मैं ॥
दुनिया गिरे पड़ों को और ठोकरें जड़े ,
खाकर उसी की लात तो सँभल रहा हूँ मैं ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

लाजवाब !!!

जब तक लचक थी हड्डियों में मैं नहीं झुका ,
अब सख़्त हैं तो झुकने को मचल रहा हूँ मैं ॥


जब तक लचक थी हड्डियों में मैं नहीं झुका ,
अब सख़्त हैं तो झुकने को मचल रहा हूँ मैं ॥ लाजवाब
धन्यवाद ! Lekhika "Pari m Shlok' जी !

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