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Showing posts from November, 2013

*मुक्त-मुक्तक : 391 - यहाँ से कहीं और...................

यहाँ से कहीं और 
को जाइएगा ॥ मेरे आगे मत हाथ 
फैलाइएगा ॥ मेरा देना ज्यों ऊँट 
के मुँह में जीरा , मैं दरवेश ख़ुद मुझसे 
क्या पाइएगा ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 390 - सात रंग न डाले........................

सात रंग न डाले 
डाला रँग काला ॥ जिसमें आटा थोड़ा 
नमक बहुत डाला ॥ अपना हरगिज़ नहीं 
दुश्मने जाँ है वो, मेरी ऐसी क़िस्मत को 
लिखने वाला ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 389 - चिलग़ोज़ा , काजू.................

चिलग़ोज़ा , काजू , बादाम से 
थोथा चना हुआ ॥ आग – आग से धुआँ – धुआँ सा 
कोहरा घना हुआ ॥ पूछ रहा है जानबूझकर 
तो फ़िर सुन ले राज़ , हाँ , तेरे ही इश्क़ में ज़ालिम 
मैं यों फ़ना हुआ ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 388 - वो चमकदार वो रोशन..................

वो चमकदार वो रोशन 
क्यों जुप ही रहता है ? सामने क्यों नहीं आता है 
लुप ही रहता है ? बात-बेबात-बात करना 
जिसकी आदत थी , क्या हुआ हादसा कि 
अब वो चुप ही रहता है ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 387 - पलक झपकते भिखारी...............

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पलक झपकते भिखारी नवाब हो जाये ॥ सराब जलता हुआ ठंडा आब हो जाये ॥ सुना तो ख़ूब न देखा ये करिश्मा-ए-ख़ुदा , कि वो चाहे तो ज़र्रा आफ़्ताब हो जाये ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 386 - पाऊँ यही कि सब हैं........................

पाऊँ यही कि सब हैं आम 
कोई भी न ख़ास ॥ कैसा है कौन इसका जब 
लगाऊँ मैं कयास ॥ बाहर से सब ढँके - मुंदे ,
सजे – धजे मगर , अंदर हैं आधे नंगे 
या पूरे ही बेलिबास ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 385 - उसके इश्क़ से..................

उसके इश्क़ से बचना चाहे 
पर हो-हो जाये ॥ दिल उसके पुरलुत्फ़ ख़यालों 
में खो-खो जाये ॥ पहले ही कितने सर रो-रो 
बोझ उठाये है ? तिस पर उसकी वज़्नी-यादें 
भी ढो-ढो जाये ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 384 - ताल ,कूप ,नदिया...............

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ताल ,कूप ,नदिया या नल दे ॥ पीने को तत्काल ही जल दे ॥ है असह्य अब प्यास , अन्यथा कालकूट सा तरल-गरल दे ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 383 - कभी हुआ न किसी ने......................

कभी हुआ न किसी ने 
मुझे सराहा हो ॥ किया हो दोस्ताना 
झूठ ही निबाहा हो ॥ कभी भी भूलकर न 
याद आ रहा है मुझे , किसी ने प्यार किया हो 
किसी ने चाहा हो ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 382 - हल्का कहता है वो......................

हल्का कहता है वो होता है 
बोझ ढो –ढो कर ॥ ख़्वाब देखे है जागते हुए 
न सो –सो कर ॥ लोग देखे तमाम ग़म में 
हमने हँसते हुए , अजीब है वो मनाता है 
खुशियाँ रो –रो कर ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 381 - हर एक एक से एक.................

हर एक एक से एक 
बढ़कर लगे है ॥ नज़र को हसीं सबका 
मंजर लगे है ॥ मोहब्बत की दुनिया 
बसाने को लेकिन , नहीं कोई दिल 
क़ाबिले घर लगे है ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 380 - पुलिस मिलिट्री से........................

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पुलिस मिलिट्री से वानर टोली न बन जाये ॥ एटम बम से पिस्टल की गोली न बन जाये ॥ देख के अँग्रेजी के मारे हिन्दी की हालत , डर है कहीं वह भाषा से बोली न बन जाये ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 379 - कब तक भला–बुरा......................

कब तक भला–बुरा 
कहूँगा मैं शराब को ? कब तक न आख़िरश 
छुऊँगा मैं शराब को ? जिस दौरे-ग़म से मैं तड़प-
तड़प गुज़र रहा , लगता है जल्द ही 
पिऊँगा मैं शराब को ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 378 - मैं जैसा था पड़ा........................

मैं जैसा था पड़ा वैसा ही 
रहा आता पड़ा ॥ घिसटता रहता न चल सकता 
न हो पाता खड़ा ॥ ये करिश्मा किया 
अहसासे कमतरी ने मेरे , जो बन सका मैं छोटे से 
बड़े बडों से बड़ा ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 377 - हादसों से , मुश्किलों से..................

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हादसों से , मुश्किलों से हर मुसीबत से ॥ बच रहा हूँ बस दुआ से रब की रहमत से ॥ चलते हैं सब अपने अपने पाँव से लेकिन , मैं यक़ीनन उड़ रहा हूँ सिर्फ़ क़िस्मत से ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 376 - स्मृति में तुम्हारी पड़-पड़ कर...................

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स्मृति में तुम्हारी पड़-पड़ कर  जीवन का भुलक्कड़ बन बैठा ॥ सुख-शांति पूर्ण सुंदर मुख पर 
ज्यों सुदृढ़ मुक्का हन बैठा ॥ मति मारी गई जो न होती मेरी 
तेरी नयन-झील में न डूबता मैं , जिसे सब से बचाये रखा था वही 
कर तुझको समर्पित मन बैठा ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 375 - चाहे बस एक बार.........................

चाहे बस 
क बार ही मैंने ॥ ये ख़ता की 
सुधार सी मैंने ॥ मुझको लेना था 
जिसकी जाँ उसपे , ज़िंदगी अपनी 
वार दी मैंने ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 374 - निकल आई है मेरी.......................

निकल आई है मेरी 
किसलिए रोनी सी सूरत ? ग़ज़ब हैं वो जो ग़म में 
भी रखें हँसने की क़ुव्वत ॥ ग़ुलामी किसको करती है 
किसी की शाद ख़ुद कहिए ? हमेशा दर्द ही करता 
रहा मुझपे हुकूमत ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 373 - न समीप हूँ तेरे मैं न तू.......................

न समीप हूँ तेरे मैं न तू 
सशरीर यों मेरे पास है ॥ इस बात का पर पूर्णतः 
मुझको अटल विश्वास है – अव्यक्त है वाणी से जो 
व्यवहार से परिलक्षित हो – तू न माने किन्तु मेरा तेरे 
मन में स्थायी निवास है । -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 372 - तू रक़्स करे है कि.......................

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तू रक़्स करे है कि छटपटाये नचैया ? गाता है कि रोता है बता मुझको गवैया ? दुनिया से अलग तेरी ज़िंदगी का किसलिए है तौर-तरीक़ा अलग , अजब है रवैया ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 371 - अज़ीम शख़्स था.......................

अज़ीम शख़्स था 
हक़ीर से जमाने में ॥ लुटेरे सब थे वो 
मशगूल था लुटाने में ॥ हमेशा मैंने चाहा 
उसपे लादना खुशियाँ , वलेक उसका तो 
मज़ा था ग़म उठाने में ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

क्या '' नोटा " का बटन दबाना ठीक रहेगा............................

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फ़िर चुनाव का मौसम आया आ पहुँचे घर-घर नेता ॥ भीख वोट की झुक-झुक माँगें जाकर के दर-दर नेता ॥ ये गूलर के फूल फ़क़त मिलते हैं मतलब की ख़ातिर , फ़िर मशाल लेकर भी ढूँढो आते नहीं नज़र नेता ॥ एक वोट की ख़ातिर सौ-सौ झूठ बोलते फिरते हैं , कितने ही क़स्मे-वादे करते हैं सिर छूकर नेता ॥ बात जीत की छोड़ो बस मतदान ही तो हो जाने दो , जिनके पैर पखारेंगे कल मारेंगे ठोकर नेता ॥ है वास्ता  किसे जनहित से किसे देश की चिंता है , धन और नाम कमाएँ कैसे करते यही फ़िकर नेता ॥ संस्कार आदत स्वभाव कैसे वर्षों के छूटेंगे , येन-केन बन जाएँ डाकू , क़ातिल भी रहबर-नेता ॥ क्या तब भी  ''नोटा" का बटन दबाना ठीक रहेगा जब , लंपट ,चालू ,चोर ,उचक्के ,ठग हों ज़्यादातर नेता ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

109 : मुक्त-ग़ज़ल - इतनी आबादी न थी........................

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इतनी आबादी न थी तब आदमी था क़ीमती ॥ अब तो बकरे से भी सस्ती आदमी की ज़िंदगी ॥ पालना मुश्किल है इक औलाद का महँगाई में , फ़िर भी बच्चों पर भी बच्चे जन रहा है आदमी ॥ इक तरफ़ पंखे भी कूलर भी तबेले में लगे , और घर में फुंक रहा है गर्मियों में आदमी ॥ जैसे बस हो इक अनार और सैकड़ों बीमार हों , आजकल इक चीज़ ऐसी हो गई है नौकरी ॥ पहले महमाँ देखकर कहते थे घर आया ख़ुदा , अब तो मेहमानों से नफ़रत आदमी को हो रही ॥ यूँ तो हैं पहचान के कई सैकड़ों इस शहर में , पर मुझे अपना नहीं सचमुच लगा एकाध भी ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 370 - ज़रूर मेरी सोच.................

ज़रूर मेरी सोच 
कुछ अजीब लगती है ॥ ग़लत , फिज़ूल ; किज़्ब 
के क़रीब लगती है ॥ मगर यकीं है कई
 बार हादसों की वजह , मुझे नसीब , नसीब 
और नसीब लगती है ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 369 - उसकी जिह्वा अति कटुक..................

उसकी जिह्वा अति कटुक 
अति तिक्त है ॥ पूर्णतः मधु - खांड रस से 
रिक्त है ॥ पूछने पर क्यों ?
तो वह कहता है यह _ दुःख से वह आपाद - 
मस्तक सिक्त है ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 368 - पेशानी पे चन्दन - तिलक...................

पेशानी पे चन्दन - तिलक 
लगा रहे हो तुम ॥ क्या दिल के कालेपन को 
यों छिपा रहे हो तुम ? क्या हो गया है पाप 
कोई ? बार – बार जा , गंगा में कभी जमुना में 
नहा रहे हो तुम ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 367 - ये किसकी उसपे......................

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ये किसकी उसपे यक-ब-यक पड़ी रे बद निगाह ? ये किसकी लग गई रे उसको हाय - हाय आह ॥ वो ख़्वाब की तामीर जो हुई ही थी दे के दम , बा नामो-निशां दम के दम गिरी हुई तबाह ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 366 - बड़े अदब ब क़ाइदा...................

बड़े अदब ब क़ाइदा 
बहुत करीने से ॥ कभी दीवारो दर से टिक 
तो गाह ज़ीने से ॥ आज पहचान भी नहीं रहे 
जिसे कल तक , हज़ार बार लगाया था 
अपने सीने से ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति