फिर से जग को...................


फिर से जग को चाहिए रामचन्द्र प्रादर्श ॥ 
अब तक हुआ न दूसरा उन जैसा आदर्श ॥ 
डॉ. हीरालाल प्रजापति

Comments

Popular posts from this blog

विवाह अभिनंदन पत्र

विवाह आभार पत्र

मुक्त ग़ज़ल : 267 - तोप से बंदूक