*मुक्त-मुक्तक : 357 - ख़ुशहाल दिल को जब्रन.................


ख़ुशहाल दिल को जब्रन नाशाद करके रोऊँ ॥
आबाद ज़िंदगानी बर्बाद करके रोऊँ ॥
क्या हो गया है मुझको उस सख़्त-बेवफ़ा को ,
मैं क़ब्र में पहुँचकर भी याद करके रोऊँ ?

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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