*मुक्त-मुक्तक : 356 - तू काट कर भी..................


तू काट कर भी रख दे 
मेरे पाँव मैं मगर ,
पूरा करूँगा जिसपे 
चल पड़ा हूँ वो सफ़र ॥
राहों को भर दे चाहे तू
 काँटों से नुकीले ,
मज़बूत इरादों से 
ढ़ूँगा वो रौंदकर ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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