*मुक्त-मुक्तक : 355 - वो बर्फ़ ओढ़े अंदर.....................


वो बर्फ़ ओढ़े अंदर 
होली सा जल रहा है ॥
ऊपर है ठहरा-ठहरा 
नीचे वो चल रहा है ॥
हस्ती में उसकी क़ामिल 
जद्दोजहद है फिर भी ,
हालात के मुताबिक़ 
पानी सा ढल रहा है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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