107 - मुक्त-ग़ज़ल - सबके सपने.....................


सबके सपने सच कब होते ?
खाएँ मगर इनमें सब गोते ॥
जो बेवजह ही हँसते अक्सर ,
उनमें झरते ग़म के सोते ॥
रटते मत फँसना ,मत फँसना
जाल फँसे सब अहमक़ तोते ॥
उनके खेत न फलते केले ,
जो खेतों में बेर हैं बोते ॥
जिनको ग़म इफ़्रात में मिलते ,
ऐसे लोग बहुत कम रोते ॥
ख़ुद का बोझ ही कब उठता है ?
सब अपने अपने ग़म ढोते ॥
मैल ज़मीरों पर तारी है ,
लेकिन लोग बदन भर धोते ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

सुन्दर प्रस्तुति ....!
आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (05-10-2013) को "माता का आशीष" (चर्चा मंच-1389) पर भी होगी!
शारदेय नवरात्रों की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
बहुत बहुत धन्यवाद ! रूपचन्द्र शास्त्री मयंक जी !
बहुत बहुत धन्यवाद ! राजीव कुमार झा जी !
मैल जमीरों पर तारी है
फिर भी लोग बदन भर धोते।
सही कहा।
धन्यवाद ! आशा जोगळेकर जी !
Anonymous said…
Hi there it's me, I am also visiting this website on a
regular basis, this web site is truly fastidious and the
users are in fact sharing pleasant thoughts.

Take a look at my website: domain

Popular posts from this blog

विवाह अभिनंदन पत्र

विवाह आभार पत्र

मुक्त ग़ज़ल : 267 - तोप से बंदूक