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Friday, October 4, 2013

107 - मुक्त-ग़ज़ल - सबके सपने.....................


सबके सपने सच कब होते ?
खाएँ मगर इनमें सब गोते ॥
जो बेवजह ही हँसते अक्सर ,
उनमें झरते ग़म के सोते ॥
रटते मत फँसना ,मत फँसना
जाल फँसे सब अहमक़ तोते ॥
उनके खेत न फलते केले ,
जो खेतों में बेर हैं बोते ॥
जिनको ग़म इफ़्रात में मिलते ,
ऐसे लोग बहुत कम रोते ॥
ख़ुद का बोझ ही कब उठता है ?
सब अपने अपने ग़म ढोते ॥
मैल ज़मीरों पर तारी है ,
लेकिन लोग बदन भर धोते ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

7 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

सुन्दर प्रस्तुति ....!
आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (05-10-2013) को "माता का आशीष" (चर्चा मंच-1389) पर भी होगी!
शारदेय नवरात्रों की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

डॉ. हीरालाल प्रजापति said...

बहुत बहुत धन्यवाद ! रूपचन्द्र शास्त्री मयंक जी !

राजीव कुमार झा said...

बहुत सुन्दर .
नई पोस्ट : नई अंतर्दृष्टि : मंजूषा कला

डॉ. हीरालाल प्रजापति said...

बहुत बहुत धन्यवाद ! राजीव कुमार झा जी !

आशा जोगळेकर said...

मैल जमीरों पर तारी है
फिर भी लोग बदन भर धोते।
सही कहा।

डॉ. हीरालाल प्रजापति said...

धन्यवाद ! आशा जोगळेकर जी !

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