106 : मुक्त-ग़ज़ल - ख़ुद पे जब जब भी............................


ख़ुद पे जब जब भी कभी आँख उठाई हमने ॥
कुछ न कुछ तो कमी हर बार ही पाई हमने ॥
जिसकी कर दी है ख़ुशामद कभी कभी खुलकर ,
पीठ पीछे उसीकी की है बुराई हमने ॥
ख़्वाब-दर-ख़्वाब पड़े देखने की फ़ितरत में ,
शेख़चिल्ली सी ख़ुद की छाप बनाई हमने ॥
वो तो ख़ुश होगा ही पहुँचा है जो बुलंदी पर ,
अपनी हस्ती ख़ुद आस्माँ से गिराई हमने ॥
जो भी मेहनत की कमाई थी वो सारी दौलत ,
लॉटरी और जुएँ में है गँवाई हमने ॥
कौन से हक़ से न छूने दें हम शराब उन्हे ,
ख़ुद भी पीयी है और औरों को पिलाई हमने ॥
उनके क़ाबिल न कोई तोहफ़ा था पास अपने ,
दिल दिया अपना जान अपनी लुटाई हमने ॥
कर्ण के नाम से मशहूर है जो उस घर से ,
जब भी माँगी है कभी भीख न पाई हमने ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (04-10-2013) को " लोग जान जायेंगे (चर्चा -1388)
"
पर लिंक की गयी है,कृपया पधारे.वहाँ आपका स्वागत है.
धन्यवाद ! राजेंद्र कुमार जी !
Reena Maurya said…
बेहतरीन गजल...
:-)
Badiya Gazal.
Meri bhi ek kuch linene Charchamanch main Chhapi hai. Main aapke sahar Gadarwara ka hu.
धन्यवाद ! राजीव कुमार झा जी !
धन्यवाद ! सारिक खान जी !

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