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Showing posts from October, 2013

*मुक्त-मुक्तक : 359 - कब वो मेरा है मेरे.................

कब वो मेरा है मेरे 
हुस्न का फ़िदाई है ॥ उसको बस जिस्म से ही 
मेरे आश्नाई है ॥ ख़ूबसूरत रहूँगी तब ही तक 
वो चाहेगा , मानूँ न मानूँ वलेकिन 
यही सचाई है ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 358 - चलती गाड़ी के लिए................

चलती गाड़ी के लिए 
लाल सी झंडी होगा ॥ उबलता बर्फ़ ; चाय 
फ़ीकी औ ठंडी होगा ॥ अजनबी है वो मगर 
मुझको लगता चेहरे से , उसके जैसा न कोई 
दूजा घमंडी होगा ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

L O C tension

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अपने इन  हालात के ख़ुद ही तो हम जिम्मेदार नहीं ? शांति शांति क्योंकर चिल्लाएँ ? क्या हम पे हथियार नहीं ? समझ के दुश्मन फुफकारों को गीदड़ भभकी वार करे , क्या विषदंत का मालिक फिर भी डसने का हक़दार नहीं ? नहीं बन रहा गिद्ध कबूतर बहुत कोशिशें कर देखीं , क्यों कपोत भी गरुड़-बाज बनने को फिर तैयार नहीं ? अब जवाब ईंटों का हमको पत्थर से देना होगा , वरना दुश्मन समझेगा हम ताक़तवर दमदार नहीं ॥ वक़्त न लातों के भूतों पर बातों में बर्बाद करो , समझ न पाएगा अहमक़ जब तक देंगे फटकार नहीं ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 358 - तमाम जद्दोजहद.....................

तमाम जद्दोजहद 
मुश्किलों के बाद मिला ॥ तीखी कड़वाहटों के 
बाद मीठा स्वाद मिला ॥ अपनी तक़्दीर कि लाज़िम 
जो जब भी हमको रहा , हमेशा उससे कम ही 
पाया कब ज़ियाद मिला ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 357 - ख़ुशहाल दिल को जब्रन.................

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ख़ुशहाल दिल को जब्रन नाशाद करके रोऊँ ॥ आबाद ज़िंदगानी बर्बाद करके रोऊँ ॥ क्या हो गया है मुझको उस सख़्त-बेवफ़ा को , मैं क़ब्र में पहुँचकर भी याद करके रोऊँ ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : इष्ट मित्र ?

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पंक में खिलते कँवल को मानते हो अति पवित्र ॥ जंगली पुष्पों में भी तुम सूँघते फिरते हो इत्र ॥ किन्तु कोई झोपड़ी में जन्मता है जब मनुज , हिचकिचाते क्यों बनाने में उसे तुम इष्ट मित्र ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति

फिर से जग को...................

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फिर से जग को चाहिए रामचन्द्र प्रादर्श ॥ अब तक हुआ न दूसरा उन जैसा आदर्श ॥ डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 356 - तू काट कर भी..................

तू काट कर भी रख दे 
मेरे पाँव मैं मगर , पूरा करूँगा जिसपे 
चल पड़ा हूँ वो सफ़र ॥ राहों को भर दे चाहे तू
 काँटों से नुकीले , मज़बूत इरादों से 
ढ़ूँगा वो रौंदकर ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 355 - वो बर्फ़ ओढ़े अंदर.....................

वो बर्फ़ ओढ़े अंदर 
होली सा जल रहा है ॥ ऊपर है ठहरा-ठहरा 
नीचे वो चल रहा है ॥ हस्ती में उसकी क़ामिल 
जद्दोजहद है फिर भी , हालात के मुताबिक़ 
पानी सा ढल रहा है ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

देवी गीत (1) तीनों ताप से जलती दुनिया................

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॥ तुम निर्मल मल ग्रसित जगत मन ,पावन कर दो मैया ॥ ॥ हर  लो  सब  मन  की  विकृतियाँ ,जीवन भर को मैया ॥ तीनों तापों से जलती दुनिया मैया आग बुझाओ ॥ औंधे मुँह सब लोग पड़े हैं आके आप उठाओ ॥1॥ तीनों तापों से जलती दुनिया................................. काम क्रोध मद लोभ मोह मत्सर में सभी फिरते हैं । स्वार्थ मगन दुनिया वाले मतलब को उठे गिरते हैं । विषय वासनाओं के दल दल से मन प्राण बचाओ ॥2॥ तीनों तापों से जलती दुनिया................................. यह संसार असत या सत है मन में सभी ये भ्रम है । द्वैत अद्वैत की खींचातानी व्यर्थ सभी ये श्रम है । मूरख हैं सब आकर इनको तत्व ज्ञान समझाओ ॥3॥ तीनों तापों से जलती दुनिया................................. मन से वचन से तेरी जहाँ में भक्ति कहाँ सब करते ? दुष्ट अनिष्ट की आशंका वश ढोंग यहाँ सब करते । हेतु रहित अनुराग आप पद सबका आज लगाओ ॥4॥ तीनों तापों से जलती दुनिया................................. राम कहाँ रावण को जीत सकते थे शक्ति बिन तेरी ? और कहाँ मिल सकती थी वह शक्ति भक्ति बिन तेरी ? अपनी शक्ति का फिर से जग को चमत्कार दिखलाओ ॥5॥

107 - मुक्त-ग़ज़ल - सबके सपने.....................

सबके सपने सच कब होते ? खाएँ मगर इनमें सब गोते ॥ जो बेवजह ही हँसते अक्सर , उनमें झरते ग़म के सोते ॥ रटते मत फँसना ,मत फँसना जाल फँसे सब अहमक़ तोते ॥ उनके खेत न फलते केले , जो खेतों में बेर हैं बोते ॥ जिनको ग़म इफ़्रात में मिलते , ऐसे लोग बहुत कम रोते ॥ ख़ुद का बोझ ही कब उठता है ? सब अपने अपने ग़म ढोते ॥ मैल ज़मीरों पर तारी है , लेकिन लोग बदन भर धोते ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

106 : मुक्त-ग़ज़ल - ख़ुद पे जब जब भी............................

ख़ुद पे जब जब भी कभी आँख उठाई हमने ॥ कुछ न कुछ तो कमी हर बार ही पाई हमने ॥ जिसकी कर दी है ख़ुशामद कभी कभी खुलकर , पीठ पीछे उसीकी की है बुराई हमने ॥ ख़्वाब-दर-ख़्वाब पड़े देखने की फ़ितरत में , शेख़चिल्ली सी ख़ुद की छाप बनाई हमने ॥ वो तो ख़ुश होगा ही पहुँचा है जो बुलंदी पर , अपनी हस्ती ख़ुद आस्माँ से गिराई हमने ॥ जो भी मेहनत की कमाई थी वो सारी दौलत , लॉटरी और जुएँ में है गँवाई हमने ॥ कौन से हक़ से न छूने दें हम शराब उन्हे , ख़ुद भी पीयी है और औरों को पिलाई हमने ॥ उनके क़ाबिल न कोई तोहफ़ा था पास अपने , दिल दिया अपना जान अपनी लुटाई हमने ॥ कर्ण के नाम से मशहूर है जो उस घर से , जब भी माँगी है कभी भीख न पाई हमने ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

कविता : मैं नहीं कह सकता.................

मैं नहीं कह सकता................. मुझे मान्य है । सर्वथा मान्य है । आप जो कहते रहते हो प्रायः - मात्र बेटों के पिता होने के बावजूद बेटियों के बारे में । कि बेटियाँ ये होती हैं , बेटियाँ वो होती हैं । ( ये और वो से यहाँ तात्पर्य उनकी अच्छाइयाँ मात्र से है ) निरे अपवाद छोड़कर यही सच भी है किन्तु जिसे आप डंका बजा-बजा कर कह सकते हो मैं वह सब नहीं कह सकता ! हरगिज़ नहीं कह सकता ! जबकि आपकी कविताओं में चित्रित ,

*मुक्त-मुक्तक : 354 - तेरे क़द के आगे..................

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तेरे क़द के आगे ऊँचे-ऊँचे भी बौने ॥ इक तू ही लगता पूरा दूजे औने-पौने ॥ वो शख़्सियत है तू जिसका कोई भी नहीं सानी , तू बस शेरे-बब्र और सब बकरी-मृगछौने ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति